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“सख़्त ऊपर से मगर दिल से बहुत नाज़ुक हैं चोट लगती है मुझे और वो तड़प उठते हैं हर पिता में ही कोई माँ भी छुपी होती है” — TRIPURARI
सख़्त ऊपर से मगर दिल से बहुत नाज़ुक हैं
चोट लगती है मुझे और वो तड़प उठते हैं
हर पिता में ही कोई माँ भी छुपी होती है