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“नीलमणि ने जब प्रवरा की आँखों में देखा, तो उसे लगा जैसे उनमें अथाह प्रेम का कोई सागर उमड़ रहा है। नीलमणि ने जब प्रवरा को उस मूक समर्पण के भाव में देखा, तो उसकी आत्मा में स्थित प्रेम अब मूर्त रूप लेने को विकल हो उठा। निराकार अब साकार होने को व्याकुल हो उठा। पुष्प की श्रद्धा उसे अपने आराध्य तक खींच लाई—वही श्रद्धा जिसे अभिव्यक्त करने में शब्द असमर्थ थे। अंततः दोनों ने माया-रूपी-शरीर को निराकार तत्व की अनुभूति का साधन मान लिया- वही माया जो दो निराकार तत्वों के विलय में बाधक भी थी और एक-मात्र माध्यम भी।” — Pradyumna Kumar Tiwari
नीलमणि ने जब प्रवरा की आँखों में देखा, तो उसे लगा जैसे उनमें अथाह प्रेम का कोई सागर उमड़ रहा है। नीलमणि ने जब प्रवरा को उस मूक समर्पण के भाव में देखा, तो उसकी आत्मा में स्थित प्रेम अब मूर्त रूप लेने को विकल हो उठा। निराकार अब साकार होने को व्याकुल हो उठा। पुष्प की श्रद्धा उसे अपने आराध्य तक खींच लाई—वही श्रद्धा जिसे अभिव्यक्त करने में शब्द असमर्थ थे। अंततः दोनों ने माया-रूपी-शरीर को निराकार तत्व की अनुभूति का साधन मान लिया- वही माया जो दो निराकार तत्वों के विलय में बाधक भी थी और एक-मात्र माध्यम भी।