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“लोग कहते मैं निशा का करती हूँ मान-मर्दन, किन्तु निशा ने स्वयं ही कर लिया मेरा वरण। निशा मेरे संग से जगमगाती है, कालिमा उसकी मेरी लौ को सजाती है। निशा मेरे संग से होती है तृप्त, मैं उसकी नंदिनी कहलाती, निशिदीप्त।” — Pradyumna Kumar Tiwari
लोग कहते मैं निशा का करती हूँ मान-मर्दन,
किन्तु निशा ने स्वयं ही कर लिया मेरा वरण।
निशा मेरे संग से जगमगाती है,
कालिमा उसकी मेरी लौ को सजाती है।
निशा मेरे संग से होती है तृप्त,
मैं उसकी नंदिनी कहलाती, निशिदीप्त।