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“उड़ने दे परिंदों को आज़ाद फ़िज़ा में ग़ालिब जो तेरे अपने होंगे वो लौट आएं गे किसी रोज़ !” — मिर्ज़ा ग़ालिब
उड़ने दे परिंदों को आज़ाद फ़िज़ा में ग़ालिब
जो तेरे अपने होंगे वो लौट आएं गे किसी रोज़ !
“उड़ने दे परिंदों को आज़ाद फ़िज़ा में ग़ालिब जो तेरे अपने होंगे वो लौट आएं गे किसी रोज़ !” — मिर्ज़ा ग़ालिब