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“एक खूबसूरत अहसास था। एक दोस्त। जिंदगी में पहला मर्द दोस्त। मर्द कहने में परेशानी लगती थी। लेकिन हकीकत यही थी। वह मर्द था लेकिन फिर भी अपने हाथों दोस्त बना लिया गया था। उसका होना मुझे सहेजने लगा था। उसके होते यह ख्वाहिश होती थी कि उससे उलझा जाए। उसके न होने पर अफसोस भी होता झगड़े का, हँसी भी आती और फिर से झगड़ने का बहाना भी वहीं से हाथ आता। उसके होने पर मैं उसकी हर बात को काटती और उसके न होने पर हर बात को जोड़ती। उसके होने पर मैं उसके पहले न होने की वजह पूछती और उसके न होने पर, उसके तब होने को परखती। उसके होने पर मैं बच्ची बन जाती और उसके न होने पर उसकी माँ बन जाती।” — Neelakshi Singh
एक खूबसूरत अहसास था। एक दोस्त। जिंदगी में पहला मर्द दोस्त। मर्द कहने में परेशानी लगती थी। लेकिन हकीकत यही थी। वह मर्द था लेकिन फिर भी अपने हाथों दोस्त बना लिया गया था। उसका होना मुझे सहेजने लगा था। उसके होते यह ख्वाहिश होती थी कि उससे उलझा जाए। उसके न होने पर अफसोस भी होता झगड़े का, हँसी भी आती और फिर से झगड़ने का बहाना भी वहीं से हाथ आता। उसके होने पर मैं उसकी हर बात को काटती और उसके न होने पर हर बात को जोड़ती। उसके होने पर मैं उसके पहले न होने की वजह पूछती और उसके न होने पर, उसके तब होने को परखती। उसके होने पर मैं बच्ची बन जाती और उसके न होने पर उसकी माँ बन जाती।