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“चाहे कितना भी हो घनघोर अंधेरा छाया आस रखना कि किसी रोज़ उजाला होगा रात की कोख ही से सुब्ह जनम लेती है” — TRIPURARI
चाहे कितना भी हो घनघोर अंधेरा छाया
आस रखना कि किसी रोज़ उजाला होगा
रात की कोख ही से सुब्ह जनम लेती है
“चाहे कितना भी हो घनघोर अंधेरा छाया आस रखना कि किसी रोज़ उजाला होगा रात की कोख ही से सुब्ह जनम लेती है” — TRIPURARI