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“न होना तेरा कभी सबब नहीं था मेरी उदासी का आज क्यूँ फिर खल रहा है तेरा यूँ वक़्त से पहले गुज़र जाना ? वो आया और आकर चला गया तोड़ गया सब्र के मेरे सारे बाँध हाँ, वही था वह ! वही चिर-परिचित साया तेरा !” — Neelam Jain
न होना तेरा कभी सबब नहीं था मेरी उदासी का
आज क्यूँ फिर खल रहा है तेरा यूँ
वक़्त से पहले गुज़र जाना ?
वो आया और आकर चला गया
तोड़ गया सब्र के मेरे सारे बाँध
हाँ, वही था वह ! वही चिर-परिचित साया तेरा !