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“याद आता है बेमकसद नहर की पुलिया पर बैठना, खेतों में घूमना। मई-जून की गर्मी में गांव का जीवन और दिसंबर-जनवरी की रातों में खेतों की रखवाली करते किसान। वो गिलास भरकर छाछ पीना, थाली में रात की ठंडी रोटी के साथ पानी वाली हरी मिर्च और ताजा मक्खन, बाजरे की खिचड़ी में ढ़ेर सारा अलूणा घी... जिस तरह बचपन नहीं रहा, अब वे दिन भी नहीं रहे।” — Vandana Yadav
याद आता है बेमकसद नहर की पुलिया पर बैठना, खेतों में घूमना। मई-जून की गर्मी में गांव का जीवन और दिसंबर-जनवरी की रातों में खेतों की रखवाली करते किसान। वो गिलास भरकर छाछ पीना, थाली में रात की ठंडी रोटी के साथ पानी वाली हरी मिर्च और ताजा मक्खन, बाजरे की खिचड़ी में ढ़ेर सारा अलूणा घी... जिस तरह बचपन नहीं रहा, अब वे दिन भी नहीं रहे।