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“मन बहुत सोचता है कि उदास न हो पर उदासी के बिना कैसे रहा जाए ? शहर के, दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे जाए !” — सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
मन बहुत सोचता है कि उदास न हो पर उदासी के बिना कैसे रहा जाए ? शहर के, दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे जाए !