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“मैं जानकी को आवाज़ लगाने ही वाला था कि मेरी नज़र खूँटी पर टंगे हुए कुछ कपड़ों पर पड़ी. बहुत ही सुन्दर डिज़ाइन की हरे रंग की एक चुन्नी, उसी के साथ टंगे हुए थे लम्बे-लम्बे स्कर्ट्स व ढीले-ढाले टाइप के ब्लाउज़. फिर मेरी नज़र चप्पलों और सैंडलों पर पड़ी. सारे कपड़े व चप्पलें किसी बालिग़ लड़की के ही लगते थे. जब मैंने जानकी से इस विषय में पूछा तो उसने बताया कि पिछली बार जब माँ बैतूल गयीं थीं तब वहां मज़दूर प्रधान की नाती नर्मदा से मिलीं. नर्मदा तब बीमार थी. उसका अच्छा इलाज हो सके इसलिए माँ उसे अपने साथ ही भोपाल ले आईं थीं. नर्मदा का चंचलपन, उसकी सुरीली आवाज़, उसकी सुंदरता, उसका गोरा रंग, उसकी काली आँखें, काले-घने बाल माँ को भा गए. नर्मदा की साफ़-सफाई एवं रहन-सहन देखकर माँ उसे अपनी बेटी की तरह प्यार देने लगीं. नर्मदा का संक्षिप्त परिचय सुनाकर जानकी ने मुझे आश्चर्य में डाल दिया. मैं नर्मदा के प्रति सोचने लगा. ‘नर्मदा’ – इस नाम को मैंने पहले भी कई बार सुना था. नर्मदा बेशक एक भोली-भाली लड़की थी, परन्तु वह बहुत ही सुन्दर तथा आकर्षक व्यक्तित्व की है, ऐसा मैंने सुना था. - हिंदी उपन्यास ‘नर्मदा’ से, पृष्ठ संख्या - 5” — Laxman Rao