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“मैं देखती थी कि किस तरह मेरे गाँव की महिलाएं खेतों में काम करते हुए और ससुराल में पशुओं का ध्यान रखने में जीवन बिता देती हैं। यह पशु और खेत उनके नाम होते भी नहीं। घर की बहुएं दिन-रात बंधुआ मजदूर की तरह काम करती हैं। शादी होना यानी बिना तनख्वाह के घर, खेत में काम करने वाली मिल जाना क्योंकि गांव-देहात में महिलाएं पहनने के कपड़े भी अपने मायके से लेकर आती हैं। उस समय तक बस इतना ही शोषण समझ आता था।” — Vandana Yadav
मैं देखती थी कि किस तरह मेरे गाँव की महिलाएं खेतों में काम करते हुए और ससुराल में पशुओं का ध्यान रखने में जीवन बिता देती हैं। यह पशु और खेत उनके नाम होते भी नहीं। घर की बहुएं दिन-रात बंधुआ मजदूर की तरह काम करती हैं। शादी होना यानी बिना तनख्वाह के घर, खेत में काम करने वाली मिल जाना क्योंकि गांव-देहात में महिलाएं पहनने के कपड़े भी अपने मायके से लेकर आती हैं। उस समय तक बस इतना ही शोषण समझ आता था।