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“दामिनी सी मुस्कान, व्यंग्य के समान, सुखाकर रक्त तप्त, हरता है प्राण, करता उपहास, कर पुष्प में निवास, रच विष कूट, स्वयं मधुमय मिठास, कोयल सा मधुर, झरनों का संगीत, मृत्यु का कोलाहल बन करता भीत।” — Pradyumna Kumar Tiwari
दामिनी सी मुस्कान, व्यंग्य के समान,
सुखाकर रक्त तप्त, हरता है प्राण,
करता उपहास, कर पुष्प में निवास,
रच विष कूट, स्वयं मधुमय मिठास,
कोयल सा मधुर, झरनों का संगीत,
मृत्यु का कोलाहल बन करता भीत।