“लेकिन आदमी हँसता है, दुख-दर्द सभी में आदमी हँसता हैं। जैसे हँसते-हँसते आदमी की प्रसन्नाता थक जाती है वैसे ही कभी-कभी रोते-रोते आदमी की उदासी थक जाती है और आदमी करवट बदलता है। ताकि हँसी की छाँह में कुछ विश्राम कर फिर वह आँशुओं की कड़ी धूप में चल सके।” PainHappinessLaughterCrying Book:गुनाहों का देवता Source: गुनाहों का देवता