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Bhagwaticharan Verma Books

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“श्वेतांक, यह याद रखना कि मनुष्य स्वतन्त्र विचारवाला प्राणी होते हुए भी परिस्थितियों का दास है. और यह परिस्थिति–चक्र क्या है, पूर्वजन्म के कर्मों के फल का विधान है. मनुष्य की विजय वहीं सम्भव है, जहाँ वह परिस्थितियों के चक्र में पड़कर उसी के साथ चक्कर न खाए, वरन् अपने कर्तव्याकर्तव्य का विचार रखते हुए उस पर विजय पावे.”

“लक्ष्यहीन पथिक?’–बीजगुप्त की विचारधारा बदल गई.–क्या कोई भी व्यक्ति लक्ष्यहीन है–अथवा लक्ष्यहीन होना व्यक्ति के लिए कभी सम्भव है? शायद ‘हाँ’–बीजगुप्त असमंजस में पड़ गया. एक दूसरा प्रश्न उसी समय उसके सामने खड़ा हो गया–‘क्या मनुष्य का कोई लक्ष्य भी है? कोई भी व्यक्ति बता सकता है कि वह क्या करने आया है, क्या करना चाहता है और क्या करेगा? नहीं, यही तो नहीं सम्भव है. मनुष्य परतन्त्र है. परिस्थितियों का दास है, लक्ष्यहीन है. एक अज्ञात शक्ति प्रत्येक व्यक्ति को चलाती है. मनुष्य की इच्छा का कोई मूल्य ही नहीं है. मनुष्य स्वावलम्बी नहीं है, वह कर्त्ता भी नहीं है, साधन–मात्र है!”

“संसार में इस समय दो मत हैं. एक जीवन को हलचलमय करता है; दूसरा, जीवन को शान्ति का केन्द्र बनाना चाहता है. दोनों ओर के तर्क यथेष्ट सुन्दर हैं. यह निर्णय करना कि कौन सत्य है, बड़ा कठिन कार्य है.”