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Rajesh Goyal, राजेश गोयल Quotes

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Famous Rajesh Goyal, राजेश गोयल Quotes

“नमस्कार। क्या आपने सोचा है कि हमारी असली मंजिल क्या है और वो कितनी दूर है? वो है - अपने ऋण-अनुबंध, कौल-करार पूरे करते हुए, कर्तव्यों का पालन करते हुए - बोध प्राप्त करना, परमात्मा को अपने भीतर महसूस करना और पूर्णता को प्राप्त करना। और पहला कदम है – खुद को पहला कदम उठाने के लिये राजी करना। मंज़िल कोई भी क्यों न हो बस एक कदम की दूरी पर ही है। कुदरती कानून है की जैसे जैसे हम पाखण्ड और क्षुद्रता को छोड़ते जाते हैं तथा अपने चिन्तन, चरित्र और प्रयासों को ऊँचा उठाते चले जाते हैं, वैसे वैसे मंज़िल पास आती चली जाती है। इसीलिये हर कदम सूझ-बूझ कर सही दिशा में उठाना और हर पल होश से जीना प्रार्थना है। प्रभु से प्रार्थना है कि आपको उनका अनुग्रह और उनके अनुग्रह से मंज़िल जल्द ही प्राप्त हो जाये। मंगल शुभकामनाएं। श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।”

“राम राम मित्रों, आज मैं सतयुग और कलयुग के बीच के अंतर को देख रहा था। मैंने ये पाया कि यह अंतर केवल युगों (समय) का नहीं, बल्कि हमारी सोच, वचन, कर्म, स्वधर्म का ज्ञान और पालन तथा सबसे महत्वपूर्ण – बोध का अंतर है। मुझे लगता है कि उदर-भरण और परिवार का पालन-पोषण तो जीवन का लक्ष्य हमेशा से ही रहा है। तलब के तकाजे भी हर समय पर थे। मोक्ष, मान-सम्मान, धन – ये सभी इच्छाएं सदैव से मनुष्यों के मन में रही ही हैं। लेकिन सतयुग और कलयुग में इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के तरीकों में भिन्नता है। सतयुग में, शुभकर्म, मेहनत, वचन पालन और स्वधर्म पर बल दिया जाता था, जबकि कलयुग में क्षुद्रता, नीचता और अधर्म भी अपना रास्ता बना लेती है। इसीलिए मेरा मानना है कि इस बोध से पहले का समय कलयुग है और इस बोध के बाद का समय सतयुग है। बस यही बोध प्राप्त करने का सतत प्रयास हमारी प्रार्थना है। प्रभु से प्रार्थना है कि उनकी कृपा से न केवल आपको जल्द ही बोध प्राप्त हो जाये, बल्कि आपके आस पास का ऊर्जाक्षेत्र और बोद्धक्षेत्र भी लगातार बड़ा होता जाए जिससे न केवल आप अपने जीवन में खुशी और समृद्धि प्राप्त कर पायें, बल्कि अपने परिवार और समाज के लिए भी वरदान बन जायें। श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।”

“दोस्तों, यह सच है कि समझाने से लोग नहीं समझते, क्योंकि अगर समझ पाते तो बांसुरी बजाने वाले श्री कृष्ण कभी महाभारत नहीं होने देते। लेकिन फिर भी समझने और समझाने का प्रयास निरंतर जारी रखना चाहिए। हम सब अपने मान-सम्मान, धन-दौलत का ध्यान रखते हैं। रखना भी चाहिये। लेकिन क्या हम उस रामतत्व का ध्यान रखते हैं जो जन्म से ही हमारे अंदर छुपा है? इस रामतत्व को विकसित न कर पाना अज्ञानता है, परंतु उसे अपने हाथों नष्ट करना तो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। कोई बात नही की आप इस जन्म में पुण्य कर्मों के बल को आगे के लिये संचित नही कर पाते हैं, लेकिन ये क्या की संचित जन्मों से संचित पुण्य कर्मों को भी इस जन्म में खत्म कर दें.. ये तो कोई समझदारी की बात नही हुई । इसीलिये हर कदम संभल कर चलना, सावधानी से चलना ही प्रार्थना है। प्रभु से प्रार्थना है कि आप शुभ कर्म करते हुए, अपने रामतत्व का पोषण करते हुए और अपने आराध्य पर विश्वास रखते हुए अपनी दिव्य सम्भावनाओं को जल्दी साकार कर लें। श्री रामाय नमः। ॐ हं हनुमते नमः।।”