“कभी कभी मेरे दिल मैं ख्याल आता हैं कि ज़िंदगी तेरी जुल्फों कि नर्म छांव मैं गुजरने पाती तो शादाब हो भी सकती थी। यह रंज-ओ-ग़म कि सियाही जो दिल पे छाई हैं तेरी नज़र कि शुआओं मैं खो भी सकती थी। मगर यह हो न सका और अब ये आलम हैं कि तू नहीं, तेरा ग़म तेरी जुस्तजू भी नहीं। गुज़र रही हैं कुछ इस तरह ज़िंदगी जैसे, इससे किसी के सहारे कि आरझु भी नहीं. न कोई राह, न मंजिल, न रौशनी का सुराग भटक रहीं है अंधेरों मैं ज़िंदगी मेरी. इन्ही अंधेरों मैं रह जाऊँगा कभी खो कर मैं जानता हूँ मेरी हम-नफस, मगर यूंही कभी कभी मेरे दिल मैं ख्याल आता है” Unrequited LoveUnfulfilled Love Book:Talkhiyaan / تلخیاں Source: Talkhiyaan / تلخیاں
“चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों। न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी की। न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत-अंदाज़ नज़रों से। न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से। न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज़ नज़रों से। तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेश-क़दमी से। मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जल्वे पराए हैं। मिरे हमराह भी रुस्वाइयाँ हैं मेरे माज़ी की। तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं। तआ'रुफ़ रोग हो जाए तो उस का भूलना बेहतर। तअ'ल्लुक़ बोझ बन जाए तो उस को तोड़ना अच्छा। वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा। चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों।” DivorceAbandonmentStrangenessUnfulfilled Love Author:Sahir Ludhianvi