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Deeksha Tripathi Books

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शिवाय

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“तेरे हाथों में है मेरी डोर, तेरे बिन मेरे जीवन का न कोई ओर न कोई छोर, तू ही आदि, तू ही अनंत, तू ही इस मिथ्या जगत का एक मात्र सत्य। तुझसे दूर चाह के भी न जा सकूँ, कोई भी डगर लूँ, कोई भी राह पकडू, आखिर पहुँचू तुझ तक ही। सच कहूँ? अच्छा लगता है मुझे तेरे हाथों की कठपुतली होना! निश्चिंत हूँ मैं, के जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा है और जो होगा अच्छा होगा। क्यूंकि, नाज़ुक धागे मेरे इस नन्ही सी ज़िंदगी के लिपटे हैं तेरी सर्वव्याप्त सर्व शक्तिशाली उंगलियो से, तो चलायेगा तू जिधर उधर ही चल दूँगी, तेरा रचा खेल, तेरे दिये सुख और संघर्ष, तेरे बुने ये रेशमी जाल, मनमोहक हैं, और ये जीवन ये तो बस इंतज़ार है मेरा, अपने अस्तित्व के तुझमे फिर से वापस जा मिलने का!”

“त्रिलोकपति महादेव के ध्यान मात्र से पवित्र हो उठे अंतरमन, सच भाग्यशाली है नाग वासुकी जो विराजमान है उनकी ग्रीवा पर, भाग्यवान है चंद्र जो सुशोभित है उनके मस्तक पर, परंतु इनसे भी अधिक खुशकिस्मत है गंगा जो बहती है उनके घने केशों से”

“शिव का अभिन्न अंग हैं नंदी, शिव भक्त उन्हीं के कान में लगाएं अपनी अर्जी। जहां शिव वहां नंदी नंदी बिन शिव भक्ति अधूरी। नंदी का ही तो दूसरा नाम है समर्पण व आस्था, एवं शरणागत पर प्रेम व दया का नाम हैं नंदी नाथ।”

“अर्धनारीश्वर का रूप ले, शिव शक्ति ने दिया संदेश, नर नारी के प्रेम, सुख दुख में भागीदारी का. एक शरीर के दो अंग वो, एक सत्य के दो रूप वो, एक साथ ही उनका अस्तित्व, है मुमकिन. बिन एक के, अधूरा है दूसरा.”