“तरह–तरह के मिथक रचे गए—वीरता के, आदर्शों के। कुल मिलाकर क्या परिणाम निकले? पराजित, निराशा, निर्धनता, अज्ञानता, संकीर्णता, कूपमंडूकता, धार्मिक जड़ता, पुरोहितवाद के चंगुल में फँसा, कर्मकांड में उलझा समाज, जो टुकड़ों में बँटकर कभी यूनानियों से हारा, कभी शकों से। कभी हूणों से, कभी अफगानों से, कभी मुगलों, फ्रांसीसियों और अंग्रेजों से हारा, फिर भी अपनी वीरता और महानता के नाम पर कमजोर और असहायों को पीटते रहे। घर जलाते रहे। औरतों को अपमानित कर उनकी इज्जत से खेलते रहे। आत्मश्लाघा में डूबकर सच्चाई से मुँह मोड़ लेना, इतिहास से सबक न लेना, आखिर किस राष्ट्र के निर्माण की कल्पना है?”
Quote by Omprakash Valmiki
Work
जूठन: पहला खंड [Joothan]
Browse quotes and source details for this work. more
Author
You May Also Like
“किसी महाकवि ने हमारे जीवन पर एक भी शब्द क्यों नहीं लिखा?”
Source: जूठन: पहला खंड [Joothan]
Source: All Out War: The Full Story of How Brexit Sank Britain’s Political Class
Source: Uncommon Law: Being 66 Misleading Cases Revised and Collected in One Volume
Source: My life
Source: Lines & Lenses
Source: Lines & Lenses
“Let the muck of monarchy end with the queen.”
Source: Making Britain Civilized: How to Gain Readmission to The Human Race
Source: Lines & Lenses