“अनु दा, जाने किसने यह बात कही होगी कि 'डर के आगे जीत है'. यह तो नहीं कह सकती कि पूरी तरह से गलत है, लेकिन पूरी तरह से सही भी नहीं है. कभी-कभी डर के आगे केवल डर होते हैं. नए-नए डर. और भी बड़े से डर. अजेय से लगने वाले डर, जिन्हे शायद कभी जीता नहीं जा सकता ...!” Fear Book:Ek Anuja Source: Ek Anuja
“और सबसे अच्छी बात कि किस तरह हर कोई अपने जीवन में पीछे मुड़ कर देखने पर, ख़ुद पर घटने वाली हरेक अच्छी-बुरी घटना की कड़ियाँ एक अर्थपूर्ण ढंग से जोड़ पाता है. अपने होने की प्रक्रिया में कैसे हर कोई, थोड़ा-थोड़ा ही सही, संवरता जाता है.” LifeLiving Book:Ek Anuja Source: Ek Anuja
“एक तरह से देखा जाए तो - हर परिस्थिति, हर खेल में हमेशा केवल दो ही तो खिलाड़ी होते हैं | एक हम ख़ुद और एक निष्ठुरता. जब भी हम खुद को हारा हुआ पाते हैं, शायद कोई निष्ठुरता ही तो जीतती है हमेशा. हालातों की निष्ठुरता. ज़माने की निष्ठुरता. क़िस्मत की निष्ठुरता. संबंधो की निष्ठुरता. ख़ुद अपनी अपने से कभी निष्ठुरता.” LifeLiving Book:Ek Anuja Source: Ek Anuja
“जाने कैसी ये बात है वात्सल्य के बारे में - जितना भी मिले, कम ही लगता है. जितना भी लुटा पाओ, कम ही लगता है. और जाने केवल मुझे ही ये लगता है या और लोगों को भी लगता है.” CompassionNurturing Book:Ek Anuja Source: Ek Anuja
“कहते हैं पिछले जन्म में मोती दान किये हों तो इस जन्म में सुरीला कंठ मिलता है. तो फिर पिछले जन्म में ऐसा क्या दान किया हो तो इस जन्म में हनुमान की तरह राम मिलते होंगे या अर्जुन की तरह कृष्ण मिलते होंगे अनु दा ?” LifeLearning Book:Ek Anuja Source: Ek Anuja
“लेकिन जन्म लेने वाला हर कोई जैसे अपनी किस्मत साथ लेकर आता है, शायद हर सृजन की, हर कृति की भी अपनी किस्मत होती होगी जो - कमतर या बेहतर, किसी भी तरह का अपना कोई भवितव्य चुन ही लेती होगी, ढूँढ ही लेती होगी.” Destiny Book:Ek Anuja Source: Ek Anuja
“न होना तेरा कभी सबब नहीं था मेरी उदासी का आज क्यूँ फिर खल रहा है तेरा यूँ वक़्त से पहले गुज़र जाना ? वो आया और आकर चला गया तोड़ गया सब्र के मेरे सारे बाँध हाँ, वही था वह ! वही चिर-परिचित साया तेरा !” Death Of A Loved One Book:Ek Anuja Source: Ek Anuja
“हर क़तरा जो बहा आँखों से मेरे लिए अनमोल था हर हर्फ़ जो डूबा स्याही में वो तेरा ही बोल था इन कतरों में इन हर्फों में मेरी तो दुनिया समायी है जाने क्यों हर बार मग़र तुम पर ही ये दौलत लुटाई है... !” Devotion Book:Ek Anuja Source: Ek Anuja
“तुम्हे ज़रूर लिख भेजती लेकिन क्या-क्या. शब्द कहाँ पर्याप्त था. कोई नाद, कोई संवाद कोई भाव, कोई प्राणांश मन में निर्झर बहता रहा. कितना समेट लेती और कितना उंडेल देती इतने-कितने शब्दों में ? कभी चेतना के उस स्तर को काश पा जाती कि हर बात, हर भाव बिन कहे तुम तक पहुंचा पाती... !” Level Of Consciousness Book:Ek Anuja Source: Ek Anuja