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त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह

Book by Pradyumna Kumar Tiwari · 2 quotes · Philosophy, Human Nature, Morality

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त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह Quotes

“देवी, पुष्पेंद्र इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि बुद्धिमत्ता जब प्रेम, करुणा और परोपकार की नींव से कट जाती है, तो वह केवल विनाशकारी हो जाती है। ज्ञान यदि हृदय की संवेदनाओं से न जुड़ा हो, तो वह केवल एक धारदार शस्त्र है जो चलाने वाले को भी नहीं छोड़ता। भावनाविहीन मनुष्य उस हिंसक पशु के समान है जिसके पास विवेक तो है, पर विवेक का उपयोग केवल संहार के लिए है।”

“लोग कहते मैं निशा का करती हूँ मान-मर्दन, किन्तु निशा ने स्वयं ही कर लिया मेरा वरण। निशा मेरे संग से जगमगाती है, कालिमा उसकी मेरी लौ को सजाती है। निशा मेरे संग से होती है तृप्त, मैं उसकी नंदिनी कहलाती, निशिदीप्त।”