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त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह

Book by Pradyumna Kumar Tiwari · 3 quotes · Philosophy, Human Nature, Morality

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त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह Quotes

“नीलमणि ने जब प्रवरा की आँखों में देखा, तो उसे लगा जैसे उनमें अथाह प्रेम का कोई सागर उमड़ रहा है। नीलमणि ने जब प्रवरा को उस मूक समर्पण के भाव में देखा, तो उसकी आत्मा में स्थित प्रेम अब मूर्त रूप लेने को विकल हो उठा। निराकार अब साकार होने को व्याकुल हो उठा। पुष्प की श्रद्धा उसे अपने आराध्य तक खींच लाई—वही श्रद्धा जिसे अभिव्यक्त करने में शब्द असमर्थ थे। अंततः दोनों ने माया-रूपी-शरीर को निराकार तत्व की अनुभूति का साधन मान लिया- वही माया जो दो निराकार तत्वों के विलय में बाधक भी थी और एक-मात्र माध्यम भी।”

“कविता उन में विलीन हो रही है, वह कविता में और शेष है सिर्फ असीम अखंडित आनंद जो एक अखंड शून्य की भाँति अगणित भागों में खण्डित हो रहा, किन्तु प्रत्येक भाग वही पूर्ण शून्य है।”

“लोग कहते मैं निशा का करती हूँ मान-मर्दन, किन्तु निशा ने स्वयं ही कर लिया मेरा वरण। निशा मेरे संग से जगमगाती है, कालिमा उसकी मेरी लौ को सजाती है। निशा मेरे संग से होती है तृप्त, मैं उसकी नंदिनी कहलाती, निशिदीप्त।”