त्रिकूट: धर्म का चक्रव्यूह
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“कामना जब धर्म से विमुख हो जाती है, तो वह 'लोलुपता' बन जाती है।”
“संप्रभुता का मूल्य चुकाकर प्राप्त किया गया वैभव, निर्धनता से भी अधिक कलंकित होता है।”
“शांति जब बहुत लंबी और गहरी होने लगे, तो वह अक्सर किसी बड़े झंझावात की पूर्व-सूचना होती है।”
“स्वार्थ ऐसा हो, कि स्वार्थ और परमार्थ में अभेद हो जाए।”