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Hindi Quotes

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Hindi Quotes

“I don‟t hate men,” she said, giving him a quick glance before returning her attention to keeping her horse in line. “I think you‟re a bit overrated, butthat‟s not hating . Men have ruled women and the world by virtue of their gender for several hundred years.” “Cream always rises to the top,” he replied. “This isn‟t about cream. It‟s about ruling through physical and mental intimidation. We all have strengths and weaknesses. The difference is,most women are willing to discuss both, while most men only want to talk about their strengths.”

“इसी वनवास में मैं यह भी जान पाई कि ॠषि-मुनि वन में जाकर तपस्या क्यों किया करते है। निसर्ग और मानव का नाता अनादि अनंत है। ये दोनाें मानो जुड़वाँ भाई हैं। इसीलिए निसर्ग के सान्निध्य में जीवन अपनी सारी सच्चाइयाँ लेकर हमारे सामने प्रकट हो जाता है। मानव यह समझने लगता है कि जीवन की असली शक्ति क्या है और उसकी सही-सही मर्यादाएं क्या हैं। मानव निसर्ग से दूर हो जाता है तो उसका जीवन एकांगी होने लगता है। उस कृत्रिम और एकांगी जीवन में उसकी कल्पनाएं, भावनाएं, वासनाएं सब अवास्तविक और विकृत बन जाती हैं। वो तो मेरा सौभाग्य था जो अभागिन होते हुए भी मैं यहाँ आई और जीवन की जड़ में जो सत्य हुआ करता है उसका दर्शन कर सकी।”

“हौसले बुलंद करके ही अथाह समंदर पार होते हैं, लहर से तू डरता है क्यूँ, मरू में भी भंवर होते हैं। English Translation: Be brave. And if you are brave enough, you can cross the deepest of the oceans. Don't be afraid of the tidal waves. Tornados occur even in deserts.”

“विविधता ही इस जीवन की देह है। परस्पर विरोधी बातें ही उसकी आत्मा हैं। जीवन का रस उसका आनंद उसका सम्मोहन उसकी आत्मा...इसी विविधता में है, विरोध में है।”

“मानव जीवन में आत्मा रथी, शरीर रथ, बुद्धि सारथी और मन लगाम है। विविध इंद्रियाँ घोड़े हैं। उपभोग के सभी विषय उसके रास्ते हैं और इंद्रियाँ और मन से युक्त आत्मा उसका भोक्ता है।”

“प्रेम मनुष्य को अपने से परे देखने की शक्ति देता है। प्रेम किसी से भी हो गया हो, मनुष्य से अथवा वस्तु से; किन्तु वह प्रेम सच्चा होना चाहिए। अन्तःकरण की तह से उठता हुआ आना चाहिए! वह स्वार्थी, लोभी या धोखेबाज़ नहीं होना चाहिए। राजकन्ये, सच्चा प्रेम हमेशा निःस्वार्थी होता है, निरपेक्ष होता है। फिर वह फूल से किया गया हो या किसी जीव से। प्रकृति की सुन्दरता से हो या माता-पिता से। प्रीतम या प्रेयसी से किया हो अथवा वंश, जाति या राष्ट से! निःस्वार्थ, निरपेक्ष, निरहंकार प्रेम ही मनुष्य की आत्मा के विकास की पहली सीढ़ी होती है। इस तरह का प्रेम केवल मनुष्य ही कर सकता है!”

“किसी व्यक्ति/बात का पक्ष लेने में ज्ञान हमारी मदद भी करता है और रोकता भी है। फैसला करने से पहले विभिन्न अधिकृत-अनधिकृत घटकों से जाँचना ज़रूरी है कि उपलब्ध जानकारी का उद्गम कहाँ से हुआ है, क्योकि संभव है जिस जानकारी के बल पर हम सही-गलत का निर्णय कर रहे हों वह स्रोत से ही किसी पक्ष के स्वार्थ के लिए दूषित कर दी गयी हो।”

“समुद्र में तैरने का आनंद जी भर कर लेना हो तो किनारा छोड़कर गहरे पानी में काफी दूर भीतर जाना पड़ता है। कभी बारी-बारी से लहरों का आलिंगन मिलता है तो कभी उनके थपेड़े भी खाने पड़ते हैं! पल-पल प्रतिक्षण नमकीन चुंबनाें की मिठास चखनी पड़ती है, नीले पानी पर तैरते रहकर दूर दिखाई देने वाले नीले क्षितिज को अपनी बाँहों में भरने की चेष्टा करनी पड़ती है, मौत के मुँह में हँसते-हँसते सागर के अमर गीता का साथ देना पड़ता है! प्रीत की रीत भी ऐसी ही है।”

“मैं जानता हूं तुम मुझसे खुश नहीं हो पर जानता हूं एक दिन तो आएगा जब मैं भी तुम्हारे लिये सब कुछ बन जाऊंगा जैसे तुम हो मेरे लिये, जानता हूं धारा मुझे यहां अचानक देखकर तुम शॉक हो, शायद यही मेरी गलती है बिना वजह यूं ही टपक जाता हूं तुम्हारी लाइफ में, पर पता नहीं क्यों इतनी बार दूर जाने के बाद भी तुमसे अलग नहीं हो पाता...." - 'प्‍यार मुझसे जो किया तुमने' गीता शर्मा”

“चिखुरी को अभी खेत-खलिहान का फर्क समझ नहीं आया है। वह तो यह भी नहीं जानती की वह कहाँ रहती है! यह पेड़ कहाँ पर उगा हुआ है, यह कोई शहर है या गाँव है? दरअसल उसे यह जानने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी कि वह धरती के किस हिस्से में रहती है। भूख के समय उसे भोजन मिल जाता है और प्यास लगने पर पानी का इंतज़ाम भी हो जाता है। इससे आगे की चिंता उसे अब तक हुई ही नहीं। अभी वह नहीं जानती कि मौसम बदलते भी हैं और बदलाव अपने साथ संघर्ष लाता है।”

“माँ तो माँ है.. ** दूर हो तुम.. जो घर से अपने.. तो सोचते होगे.. ऑफिस में बैठे.. माँ कैसी होगी? माँ कैसी होगी? घर पे है, तो ठीक ही होगी। काम में डूबे, तुम सोचते होगे.. माँ जागती होगी.. या सोती होगी। माँ तो माँ है.. जाग ही रही है.. सोई नहीं.. शायद रोती होगी। सोचती होगी तुम आओगे.. ढूंढती होगी कौनसी राह से.. तुम दूर हो ना.. समझोगे कैसे। डरती है वो.. खाली घर के कोने से.. झूले के खाली होने से.. मौसम के बदलने से.. तुम्हारे घर से चलने से। पूछती है फिर कब आओगे.. बता देना.. साँसें थोड़ी हैं.. हक अपना जता देना। इक बार तो दिन में बात किया कर.. नींद अच्छी आती है.. तेरी आवाज़ सुनकर.. तेरी हंसी, तेरी खुशी के वास्ते.. कर दे सब कुर्बान वो तुझपे। दुआएं देती होगी.. माँ तो माँ है.. रोती होगी.. फिर चुपचाप सोती होगी।”

“Teri in aankhon mein Teri in aankhon mein kuch alag baat hai, Ek an-kahi daastan, kuch anjaane jazbaat hai, Aaj dil mein tera pyaar, haaton mein tera haat hai, Tham jaaye ab ye waqt, bas itni si darkaar hai, In aakhon mein teri chehra, baaton mein teri hi baat hai, Kat jati hai yaadon k sahare, ab ye lambi kali raat hai, Ek aag si lagti hai, bekaraar ho jate jazbaat hai, Kar deta hai agar koi, tanhaaiyon mein teri baat hai, In saanso mein teri hi mehak, aakhon mein tera hi aks hai, Tuje soch soch kat jate, mere ab din aur raat hai, Teri in aankhon mein kuch alag baat hai, Ek an-kahi daastan, kuch anjaane jazbaat hai,”

“Apni zindgi mein kari galti kam nahi, Jiske liye khuda se kari binti kam nahi, Jiske liye humne bitaye jaagte raate kam nahi, Uske liye hamare ishq mein dum nahi, Aate aate uski yaad aati kam nahi, Kisi dawa se hota ye dard kam nahi, Waqt bewaqt hoti aksar Aankhen nam Kam nahi, Jab jab aati uski yaad, aur hum rehte hum nahi, Apni zindgi mein kari galti kam nahi, Jiske liye khuda se kari binti kam nahi”

“Na hum kisi k, na koi hamara, Kon chale saath, kon bane Sahara, Beet Gaya vo waqt, kal jo tha hamara, Reh Gaya bas dard, aur ek zakhm gehra, Aksar yaad aata, uska woh chehra, Kuch bhooli baatein, aur hasna woh hamara, Jate jate aksar, uska woh ruk jana, Aur ye kehna, kaash thaher jaye ye waqt hamara, Jabhi yaad karta hu mein, apna woh waqt sunhera, Saath chali aati hai, uski yaadon ka pehra, Ab aur kya bataun, khul na jaye ye raaz hamara, Varna mazaak udayegi ye duniya, Tuta dil hai bechara, Na hum kisi k, na koi hamara, Kon chale saath, kon bane Sahara”

“आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख घर अँधेरा देख तू आकाश के तारे न देख एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ आज अपने बाजुओं को देख पतवारें न देख अब यक़ीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह यह हक़ीक़त देख, लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे कट चुके जो हाथ ,उन हाथों में तलवारें न देख दिल को बहला ले इजाज़त है मगर इतना न उड़ रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख ये धुँधलका है नज़र का,तू महज़ मायूस है रोज़नों को देख,दीवारों में दीवारें न देख राख, कितनी राख है चारों तरफ़ बिखरी हुई राख में चिंगारियाँ ही देख, अँगारे न देख.”