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“ऐ सुनो न, महादुष्ट और चोट्टेकुमार, मुझे एक चिट्ठी लिखो न! हे आलसावतार, तुमसे कोढ़ी भी लजा जाए. हमरा एतना चिट्ठी पढ़े हो बैठ के जाड़ा में, चूल्हा में पकाया अल्लू खाते हुए. भुक्खड़ रे, ई सब से ऊपर उठ के एक ठो हमको चिट्ठी लिखो न. ऐसे कईसे चलेगा, खाली कोहरा पी के जिए आदमी, बतलाओ, ठंढा का दिन आया, हाथ गोड़ अकड़ रहा है. ए गो तुमरा चिट्ठी आता तो हम भी न बैठ के अलाव तापते हुए पढ़ते. बचवन सब को बतलाते ई हमार चोट्टा दोस्त है. तुम लोग अगर बेसी सुधरे हुए निकल गए कहीं गलती से तो तुम सबको इसी के पास भेज देंगे, चोट्टागिरी का ट्यूशन लगाने.”

“स्कूल वाला प्यार सबकी जिंदगी का पहला पहला प्यार होता, सब कुछ क्या क्या फील करवाता है। स्कूल वाले प्यार में एक अनोखी पवित्रता होती है जो अंतिम सांस तक दिल की धड़कनों को जिंदा रखती है ।”

“जब उदास लम्हों की रंगीन तितलियाँ मेरी आँखों में रक़्स करती हैं, तो सीने की वीरानी में अफ़्सानों का एक जंगल उगने लगता है। दरख़्तों की टहनियों पर गाते हुए परिंदों की बोली में मेरे माज़ी के हसीन होंटों की हँसी साफ़ साफ़ सुनी जा सकती है।”

“ग़म और ख़ुशी के दर्मियान झूलती हुई उदासी कोई ऐसी शय नहीं जिससे छुटकारा पाया जा सकता है। ये एक ऐसी ख़ुशबू है जिसे भीतर ही भीतर जज़्ब करना होता है।”

“यादों की सबसे ख़ास बात ये होती है कि वो कभी साथ नहीं छोड़तीं। आप चाहे कहीं भी जाएं, साथ चल पड़ती हैं। और यादें अगर अच्छी हों तो ये बहुत ही खूबसूरत घटना है।”

“खिड़कियों में कुछ तो खास होता है। चाहे आप अपनी खिड़की से बाहर देखें या बाहर से किसी खिड़की को देखें (झांकें नहीं)। चाहे वो ट्रेन की खिड़की हो या फिर किसी वीरान पड़े घर की खिड़की।”

“इस ढलते सूरज को देख रहे हो?' उसने कहा। 'मैं हमेशा उदास हो जाती हूँ इसे देखकर, ये जानते हुए कि ये सूरज कल लौटेगा, एक नई चमक के साथ। सोचो, कितना मुश्किल होता होगा उसे जाने देना जिसके लौटने की कोई उम्मीद न हो?”

“कहाँ थी मैं? इन्द्रलोक के नंदनवन में? मंदाकिनी में बहती आई हरसिंगार की सेज पर? मलयगिरि से चलने वाली शीतल सुगंधित पवन के झकोरों पर? या विश्व के अज्ञात सौंदर्य की खोज में निकले किसी महाकवि की नौका में?”

“स्त्री के शरीर और पुरुष के शरीर में स्त्री और पुरुष के मन में, स्त्री और पुरुष के जीवन में, कितना अन्तर होता है! पुरुष अमूर्त के पीछे सहज दौड़ता है। इसीलिए उसे कीर्ति, आत्मा, पराक्रम, परमेश्वर आदि बातों में तुरन्त आकर्षण लगने लगता है! किन्तु स्त्री इन बातों पर आसानी से मोहित नहीं होती। उसे प्रीति, पति, संतान, सेवा, घर, गृहस्थी आदि मूर्त बातों का अधिक आकर्षण होता है। वह संयम बरतती है त्याग भी करती है किन्तु वह सब मूर्त बातों के लिए! उसे अमूर्त के प्रति उतना लगाव नहीं होता जितना पुरुष को। अपना सर्वस्व देकर पूजने के लिए अपने आँसुओं का अभिषेक करने के लिए स्त्री को एक मूर्ति की आवश्यकता हुआ करती है। पुरुष स्वभावतः आकाश का पुजारी है! स्त्री को धरती की पूजा अधिक प्यारी है!”

“जीवन में हर सांस में ‘हे ईश्वर मेरी इच्छा पूर्ण हो” कहने की बजाये “हे ईश्वर आपकी इच्छा पूर्ण हो” कहना ही हमारे लिये सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना है। अधिकांश लोग ईश्वर को मानने का ढोंग तो करते हैं मगर दुर्योधन की तरह अपने कृत्यों को करते हुए उनके होने को भूल जाते हैं। दुर्योधन की तरह श्री हरि की उपेक्षा करके कोई कैसे इस जीवन संग्राम को जीत सकता है? क्या ये बात समझना बहुत मुश्किल है? केवल धार्मिक और नीतिगत कार्यों में संलग्न रहने वाले ही उनके दिव्य विराट चतुर्भुज रूप के दर्शन कर पाते हैं, जीवन यात्रा सफल कर उनके पावन अंक में स्थान पाते हैं। जो भी करें वो उनके भक्त या उनके आश्रित अर्जुन के रूप में करें। ईश्वर स्वंय आपके सारथी बन जाएंगे। प्रभु से प्रार्थना है कि आप शतायु हों, सदा स्वस्थ रहे और ऊर्जावान बने रहें तथा आपका हर दिन प्रसन्नता से भरा रहे। मंगल शुभकामनाएँ।”

“जिन्हें उगना होता है वे तो पत्थर का सीना फाड़ के भी उग जाते हैं और जिन्हें नही, वे अत्यन्त उपजाऊ भूमि में प्रयाप्त संसाधनों के बावजूद भी नहीं उग पाते हैं। आप भी आसानी से कंही भी किसी भी परिस्थिति में उग (सफल) सकते हैं। आप सम्पूर्ण हैं और आप मे प्रकृति को नियन्त्रित करने और चलाने वाली ईश्वर की असीम शक्ति निहित है। यदि आप सक्रिय इच्छाशक्ति के साथ किसी विचार को पकड़ लेते हैं, एक राह चुन लेते हैं और उस पर दृढ़ता से चलना शुरू कर देते हैं तो आपके लिए नए मार्ग अपने आप खुलते चले जाते हैं और आपकी सभी प्रार्थनाएँ, सपने, इच्छाएँ अन्ततः साकार रूप धारण कर लेती हैं। मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूं कि आपकी जो भी चुनौतियां हैं, उन्हें पूरा करने में आप सफल हों। मैं उन से आपके उत्तम स्वास्थ्य, सुदीर्घ और मंगलमय जीवन के लिए भी प्रार्थना करता हूं।”

“पूरे वर्ष, सभी क्षेत्रों में, सभी मौसमों में; हम हिंदुओं को लगभग किसी भी चीज और हर चीज की, किसी को भी और सभी की पूजा करने के लिए कारण मिलते हैं; लोगों से देवताओं तक; जानवरों से पौधों तक; ग्रहों से सितारों तक। इसलिए जीवन के छोटे-छोटे आश्चर्यों के साथ हमारा उत्साह हमेशा ऊंचा रहता है, हम लोगों से मिलना और उनका अभिवादन करना पसंद करते हैं, क्योंकि सनातन धर्म में हम मानव होने के हर पहलू का जश्न मनाते हैं। हम मानते हैं कि (भगवान) हर कण में हैं और ऊँ (ओ3म्) ब्रह्मांड के हर एक परमाणु (atOM) में है। Poore varsh, sabhee kshetron mein, sabhee mausamon mein; ham hinduon ko lagabhag kisee bhee cheej aur har cheej kee, kisee ko bhee aur sabhee kee pooja karane ke lie kaaran milate hain; logon se devataon tak; jaanavaron se paudhon tak; grahon se sitaaron tak. isalie jeevan ke chhote-chhote aashcharyon ke saath hamaara utsaah hamesha ooncha rahata hai, ham logon se milana aur unaka abhivaadan karana pasand karate hain, kyonki sanaatan dharm mein ham maanav hone ke har pahaloo ka jashn manaate hain. ham maanate hain ki bhagavaan (bhagavaan) har kan mein hain aur om brahmaand ke har ek paramaanu mein hai.”