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TRIPURARI Books

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North Campus

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“जब उदास लम्हों की रंगीन तितलियाँ मेरी आँखों में रक़्स करती हैं, तो सीने की वीरानी में अफ़्सानों का एक जंगल उगने लगता है। दरख़्तों की टहनियों पर गाते हुए परिंदों की बोली में मेरे माज़ी के हसीन होंटों की हँसी साफ़ साफ़ सुनी जा सकती है।”

“ग़म और ख़ुशी के दर्मियान झूलती हुई उदासी कोई ऐसी शय नहीं जिससे छुटकारा पाया जा सकता है। ये एक ऐसी ख़ुशबू है जिसे भीतर ही भीतर जज़्ब करना होता है।”

“आँसू ख़ुशियाँ एक ही शय है नाम अलग हैं इनके पेड़ में जैसे बीज छुपा है बीज में पेड़ है जैसे एक में जिसने दूजा देखा वो ही सच्चा ज्ञानी”

“ये सच है उनके दम से ज़िंदगी त्योहार लगती है कोई माने न माने रोज़ होली-तीज हैं वो लोग उन्हीं के दम से तो सारी ज़मीनें भी सुहागन हैं पकी फसलें छुपाए ख़ुद में ज़िंदा बीज हैं वो लोग”