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Vandana Yadav Biography

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“समाज उन लोगों के रास्ते में बेड़ियाँ ड़ालता है, जो उसकी परवाह करते हैं। अपनी मर्जी करने वालों से वह भय खाता है और भयभीत लोग, योद्धा नहीं होते।”

“इम्तेहान इंसान का हौसला जांचने आते हैं । वे तराशते हैं, जिंदगी का सलीका सिखाते हैं और दोबारा लौटने का भरोसा दे कर आगे बढ़ जाते हैं ।”

“भय की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है । वह अनदेखा है और कल्पना से परे की चीज़ है । उसके परिणाम भयंकर होने का अंदेशा है, बस इसीलिए वह डरावना है ।”

“इन्सानी फितरत है कि अनहोनी सबसे पहले कल्पना लोक से उतर कर हमारे दिमाग पर कब्जा कर लेती है और बहुत जल्दी हम उन ड़रावने विचारों को सच मान लेते हैं ।”

“जहां रौब दिखाना हो, वहां बाराती बनकर आदमी पहुंच जाते हैं लेकिन जहां शरीर को तकलीफ देनी हो, जहां परीक्षा की सूली पर चढ़ना हो, वहां महिलाओ को आगे कर दिया जाता है। हमारी मासूम कौम पीढ़ी दर पीढ़ी इस राह पर आगे बढ़ती चली जा रही है।”

“ऐसा क्यों है कि अंधेरे में सुबह चार बजे मम्मी के साथ मैं, कुएं के ठंडे पानी से नहाने जाती हूँ। कार्तिक का महीना बहुत ठंड लिए रहता है। ऐसे में सारी तपस्या सिर्फ महिलाएं क्यों कर रही हैं? पापा और पापा की तरह सब पुरूष रजाई में क्यों सो रहे हैं? क्या उन्होंने कोई पाप नहीं किए? जवाब में परंपराओं का हवाला दे दिया जाता था। मुझे फक्र होता है उस शीक्षा पर, सवाल पूछने के अधिकार के उपयोग पर जो हमें सहज उपलब्ध था।”

“जिस वक्त प्राणी जिंदा रहने के लिए जान की बाजी लगाता है, उसकी देह संघर्ष के इत्र से महक रही होती है। ऐसे महकते हुए मेहनती लोग एक-दूसरे की इज्ज़त करना जानते हैं।”

“जब इंसान के पास रिश्ते होते हैं, वह उनकी क़ीमत समझ नहीं पाता मगर जब वह समय बीत जाता है और रिश्ते दूर हो जाते हैं, तब इंसान को उसकी कद्र होने लगती है। यही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है।”

“घटनाक्रम मानसिकता पर निर्भर करता है। जब हम खुश हों तो क्यारियों में खिले फूल भी खुशी देते हैं। इसके उलट परेशानी के दौर में वही फूल मेहनत और संघर्ष के लंबे दौर का छोटा-सा परिणाम लगने लगते हैं।”

“दीवार पर लगा दरवाज़े का पहरा, वक्त के दो फाड़ कर देता है । घर के भीतर की दुनिया और दहलीज़ों के बाहर का समाज, एक ही वक्त में अलग-अलग युग जी रहे होते हैं ।”

“हम दोनों का जो नाता है एक-दूसरे के साथ ज्यों सुबह का शाम से और शाम का भोर से बीच में आने वाली अंधेरी रात और चिलचिलाती धूप को भुला जुड़े रहते हैं हम मन से एक-दूसरे के साथ बस यही इबादत है।”

“बहुत ख़ूबसूरत है साथ तुम्हारा कभी जाने की जल्दी छोड़कर बैठा करो घड़ी, दो – घड़ी बेफिक्री में साथ मेरे सुनो आज वक़्त को जाने दो तुम ठहर जाओ।”

“तुम जितना मिट्टी से खेलेगी, उतनी ही मजबूत बनोगी। माटी तुम्हें अपने जैसा बना देगी। देखो, भोजन पकाने का तापमान धातु सहन कर सकती है मगर मजबूत से मजबूत धातु को पिघलने के लिए मिट्टी के बर्तन का प्रयोग किया जाता है। यानी हमेशा सरल बनी रहना मगर मजबूती सबसे अधिक रखना। ऐसा तभी होगा जब तुम माटी का स्वभाव समझने लगोगी।" पापा ने कहा था।”

“छुटकू गिलहरी ने देखा कि खेत में रहने वाला इंसान कागज के पुलिंदे में कुछ देख रहा था। छुटकू के मन में कई दिनों से दबी हुई जिज्ञासा उठ खड़ी हुई। वह जानना चाहती थी कि इंसान कागजों में क्या करता है। हर दिन की तरह उस दिन भी वह बहुत समय से कागज़ों में कुछ किए जा रहा था।”

“छुटकू गिलहरी को याद आ रहा था कि मम्मी ने सजीव और निर्जीव में फ़र्क बताया था। उन्होंने कहा था कि जीवित पेड-पौधों और जानवरों में लचक होती है। जीवित होना यानी लचक होना। अकड़ जाना मौत की निशानी है। उसने पेड़ की डाल से नीचे देखा, सूखी टहनियां और पत्ते अकड़े पड़े थे जबकि जिस हरे-भरे पत्तों वाली पतली-सी टहनी पर छुटकू बैठी थी, वह पत्तों से लदी हुई लचीली डाल थी। उसे बात समझ आ गई थी कि जीवित रहने के लिए लचीला होना ज़रूरी है।”

“अधूरा ज्ञान भयानक स्थिति पैदा कर सकता है। छुटकू को मम्मी की बात याद थी और पत्तियों के सहारे लटकते हुए जीवन का लचीलापन भी समझ आ रहा था। वह नहीं जानती थी कि उसकी यही समझ मुसीबत का कारण बनने वाली है। यहाँ ज्ञान तो था मगर अनुभव नदारद था।”

“मासूमियत और बेफिक्री के दौर का नाम है बचपन। यही समय जीवन का सबसे समृद्ध समय भी है जब बच्चों का छल-कपट और चिंताओं से कोई वास्ता नहीं होता।”

“चिखुरी को अभी खेत-खलिहान का फर्क समझ नहीं आया है। वह तो यह भी नहीं जानती की वह कहाँ रहती है! यह पेड़ कहाँ पर उगा हुआ है, यह कोई शहर है या गाँव है? दरअसल उसे यह जानने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी कि वह धरती के किस हिस्से में रहती है। भूख के समय उसे भोजन मिल जाता है और प्यास लगने पर पानी का इंतज़ाम भी हो जाता है। इससे आगे की चिंता उसे अब तक हुई ही नहीं। अभी वह नहीं जानती कि मौसम बदलते भी हैं और बदलाव अपने साथ संघर्ष लाता है।”

“याद आता है बेमकसद नहर की पुलिया पर बैठना, खेतों में घूमना। मई-जून की गर्मी में गांव का जीवन और दिसंबर-जनवरी की रातों में खेतों की रखवाली करते किसान। वो गिलास भरकर छाछ पीना, थाली में रात की ठंडी रोटी के साथ पानी वाली हरी मिर्च और ताजा मक्खन, बाजरे की खिचड़ी में ढ़ेर सारा अलूणा घी... जिस तरह बचपन नहीं रहा, अब वे दिन भी नहीं रहे।”

“जो बाहर दिखाई देता है, उसका इलाज बाहरी तौर पर किया जाता है मगर जो भावनाओं की तह पर चल रहा होता है, उसके लिए भावनात्मक युद्ध लड़ने पड़ते हैं। अपने दर्द और खालीपन से खुद अकेले जूझना होता है तब कहीं जाकर तकलीफ से बाहर निकलने का रास्ता मिलता है।”

“मेरी उच्च शिक्षित और आत्मनिर्भर माँ जानती थी कि महिलाएं किसी भी पद पर पहुंच जाएं, घर-बार उन्हें खुद ही सम्हालना होगा इसीलिए माँ की ट्रेनिंग हर समय निर्बाध चलती रहती थी। हाँ, पापा के साथ खड़े होने के लिए मैं एक मजबूत कंधा बनने की कोशिश करती रहती थी।”

“बचपन की यादें, बचपन की समझ लिए रहती हैं। बादमें उनपर जितने रंग चढ़ाओ मगर वे तो उस रंगरेज को अपनी स्मृति सौंप चुकी होती हैं, जो पक्के रंग चढ़ाने में माहिर है।”

“जवानी और बचपन के बीच की उम्र अंगारों पर चलने जैसी होती है। बचपने भाग कर बच्चे, बड़े हो जाना चाहते हैं मगर युवा अपने अधिकार क्षेत्र में उनका स्वागत नहीं करते।”

“हमारी जीवन शैली, आज तक अंग्रेजों से प्रभावित हैं । अंग्रेजों ने सूर्योदय के देश को सूर्यास्त का उत्सव मनाने वाले देश में तब्दील कर दिया ।”

“जूआ खेलने का सदियों पुराना सामाजिक मान्यता प्राप्त नाम है खेती। इसमें किसान प्रकृति पर दांव लगाता है। सफल हुआ तो रोटी का प्रबंध हो गया, हार जाए तो अगली फसल पर फिर से दांव खेलता है।”

“फौजियों के जीवन को एक बात सबसे अलग बनाती है कि हम किसी स्थान को सैलानी की तरह नहीं, स्थायी निवासी की तरह देखते हैं। अढ़ाई-तीन वर्ष के लिए किसी जगह पर स्थायी निवासी की तरह रहना और फिर नई जगह पर वहां का बाशिंदा बन कर पहुँचना...।”

“फौज अनिश्चितता का दूसरा नाम है। यहाँ का जीवन 'अचानक कुछ भी हो सकता है' या 'हालात कभी भी बदल सकते हैं' के सिद्धांत पर काम करता है। यहाँ मौसम से ज्यादा हालात बदलते हैं।”

“मुझे उस संस्था को अपना हिस्सा लौटाने का मौक़ा मिला जिसने मेरे जीवन को नई पहचान दी। यह मेरे लिए हर दिन बहुत कुछ नया सीखने का समय बन गया। सैनिक परिवारों की परेशानियां, अकेली महिलाओं के जीवन की जद्दोजहद, उनकी काउंसलिंग, वोकेशनल ट्रेनिंग के बाद हमारी महिलाओं के लिए रोजगार की तलाश में सिविल सेक्टर से बातचीत में मदद करने जैसे अनगिनत काम...”

“फौजियों के नाम और उनकी गौरव-गाथाएं उनकी युनिट में अक्सर दोहराई जाती हैं। कभी-कभी देश भी शायद उन्हें याद कर लेता होगा पर शहीद की पत्नी का कर्ज़ ये देश कैसे चुकाएगा? देश के लिए जान देने वाले सिपाहियों के बच्चों का जवाबदेह कौन है जो बिना बाप की छत्रछाया के बड़े होते हैं।' कुसुम अपनी ही धुन में बोले जा रही थी।”

“पापा का देर रात तक रेडियो पर 'हवामहल' सुनना मुझे याद है। रात के आर जे की बातों पर हम सबका हँसना, उन रातों की रौनक बढ़ा देता था। ऐसी ही एक रात को एमरजेंसी के बाद चुनाव परिणाम घोषित हुए थे। निर्णायक परिणाम आ चुका था। इंदिरा गाँधी चुनाव हार गई थी और इस घोषणा के साथ रेडियो ने गाना बजाया, 'सबेरे वाली गाड़ी से चले जाएंगे, कुछ ले के जाएंगे, कुछ दे के जाएंगे, सवेरे वाली गाड़ी...”

“समूचा देश बैठा है। कुछ यहाँ, कुछ टेलीविजन के सामने। नागरिक, राजनेता और बड़े अधिकारी तक, सब बैठे हैं वो औरत जो शहीद की पत्नी है, वही अकेली खड़ी है। अगर खड़ा होना सम्मान की बात है तो कम-से-कम कुछ मिनिट के लिए तो शहादत के सम्मान में सबको खड़ा हो जाना चाहिए।' कुसुम ने कहा। 'ये सम्मान पाने की सजा है या सजा की शुरूआत आज यहाँ से हो रही है।' लाउडस्पीकर की आवाज़ में उसके शब्द दब गए।”